लटकि चलत राधा गरबाहीं, थिरकत अलक छला री ।
मृदु मुसिकान बिकान मनोहर, श्री वृषभानु दुलारी ॥ [1]
कोमल चरन करन मन आनन्द, नैंन निरषि मन जीजै ।
(जैश्री) वंशीअलि बलि-बलि राधा छवि, एकमेक करि पीजै ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)
जब श्री राधा श्री श्यामसुन्दर को गलबाहीं दिये लटक कर चलती हैं तब उनकी अलकें थिरकते हुए उनके चेहरे पर आती हैं । वृषभानु दुलारी श्री राधा की मुस्कान को देखकर श्री श्यामसुन्दर बिक जाते हैं । [1]
उनके कोमल चरण मन में आनंद की लहरें पैदा करती हैं और नैनों को निरख कर हृदय जीवित रहता है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि बलिहारी बलिहारी है श्री राधा की ऐसी अद्भुत छवि पर जिसका पान अनन्य भाव से (एकरस से) करना चाहिए । [2]
मृदु मुसिकान बिकान मनोहर, श्री वृषभानु दुलारी ॥ [1]
कोमल चरन करन मन आनन्द, नैंन निरषि मन जीजै ।
(जैश्री) वंशीअलि बलि-बलि राधा छवि, एकमेक करि पीजै ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)
जब श्री राधा श्री श्यामसुन्दर को गलबाहीं दिये लटक कर चलती हैं तब उनकी अलकें थिरकते हुए उनके चेहरे पर आती हैं । वृषभानु दुलारी श्री राधा की मुस्कान को देखकर श्री श्यामसुन्दर बिक जाते हैं । [1]
उनके कोमल चरण मन में आनंद की लहरें पैदा करती हैं और नैनों को निरख कर हृदय जीवित रहता है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि बलिहारी बलिहारी है श्री राधा की ऐसी अद्भुत छवि पर जिसका पान अनन्य भाव से (एकरस से) करना चाहिए । [2]

