(राग उतरी देस)
प्रिय नख चरन चंद्रिका कब धौं,
इन नैनान निहारौंगी । [1]
सुन्दर सुघर रूचिर रूचि जावक,
कब प्रिय पांय पखारौंगी ॥ [2]
पायजेब सजि नूपुर कब धौं,
पग बिचियान सवारौंगी । [3]
'ललित माधुरी' चरन सरोजैं,
चापि कबै उर धारौंगी ॥ [4]
- श्री ललित माधुरी जी
(सखी भावापन्न श्री ललित माधुरी जी कहते हैं )
कब मैं श्री प्यारी जू [राधा] की चरण नख चंद्रिका को अपनी इन नयनों से निहारूँगी । [1]
कब मैं श्री राधा के चरणों में उनको रुचिकर सुंदर महावर धारण कराऊँगी । [2]
कब मैं श्री राधा के चारणों को पायल एवं नूपुर से सवारूँगी । [3]
श्री ललित माधुरी जी कहते हैं कि कब मैं श्री राधा के चरण कमलों को चापूँगीं (दबाऊँगी) और नित्य अपने ह्रदय में धारण करके रखूँगीं । [4]
प्रिय नख चरन चंद्रिका कब धौं,
इन नैनान निहारौंगी । [1]
सुन्दर सुघर रूचिर रूचि जावक,
कब प्रिय पांय पखारौंगी ॥ [2]
पायजेब सजि नूपुर कब धौं,
पग बिचियान सवारौंगी । [3]
'ललित माधुरी' चरन सरोजैं,
चापि कबै उर धारौंगी ॥ [4]
- श्री ललित माधुरी जी
(सखी भावापन्न श्री ललित माधुरी जी कहते हैं )
कब मैं श्री प्यारी जू [राधा] की चरण नख चंद्रिका को अपनी इन नयनों से निहारूँगी । [1]
कब मैं श्री राधा के चरणों में उनको रुचिकर सुंदर महावर धारण कराऊँगी । [2]
कब मैं श्री राधा के चारणों को पायल एवं नूपुर से सवारूँगी । [3]
श्री ललित माधुरी जी कहते हैं कि कब मैं श्री राधा के चरण कमलों को चापूँगीं (दबाऊँगी) और नित्य अपने ह्रदय में धारण करके रखूँगीं । [4]

