(राग केदार)
ललित ब्रज देस गिरिराज राजें।
घोष सीमंतिनी संग गिरिवरधरन, करत नित केलि तहँ काम लाजें ॥ [1]
त्रिविध पवन संचरें, सुखद झरना झरें, ललित सौरभ सरस मघुप गाजें।
ललित तरु फूल-फल फलित षट ॠतु सदा, चतुर्भुज दास गिरधर समाजें ॥ [2]
- श्री चतुर्भुजदास जी
ललित ब्रज देस गिरिराज राजें।
घोष सीमंतिनी संग गिरिवरधरन, करत नित केलि तहँ काम लाजें ॥ [1]
त्रिविध पवन संचरें, सुखद झरना झरें, ललित सौरभ सरस मघुप गाजें।
ललित तरु फूल-फल फलित षट ॠतु सदा, चतुर्भुज दास गिरधर समाजें ॥ [2]
- श्री चतुर्भुजदास जी
ब्रज के रमणीय क्षेत्र में, श्री गिरिराजी के पावन धाम में घोष सीमंतिनी श्री राधा के साथ श्री कृष्ण निरंतर केली करते हैं जिसका दर्शन कर कामदेव भी लज्जित हो जाता है । [1]
त्रिविध पवन, सुखद झरना की झरन, ललित सौरभ का परिवहन, सरस मधुप गुंजन, षट् ऋतु फूल फल फरन आदि की जहां अद्भुत शोभा है वहीं गिरिधर लाल श्रृंगार रस बरसाते हैं । [2]

