जाये जिसे जाना हो हिमालय तप करने - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (73)

जाये जिसे जाना हो हिमालय तप करने - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (73)

(कवित्त)
जाये जिसे जाना हो हिमालय तप करने,
शीघ्र जाये जिसे प्यारी गंगा जल धारा हो। [1]
जाकर गुफाओं में योगासन लगाये खूब,
होता उद्धार यदि हठयोग के द्वारा हो॥ [2]
धूनी और पंचाग्नि भी तापे जिसे तापना हो,
करले प्रयत्न जहां जिस का सहारा हो। [3]
मैं भी यही चाहता हूं वृंदावन कुंजन में,
मैं हूं अकेला और प्रियतम हमारा हो॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (73)

जिसे हिमालय जाकर तप करना हो वो वहाँ जाकर खूब तपस्या करे, जिसे प्यारी गंगा के किनारे जाना हो वह भी शीघ्र वहाँ जाए। [1]

जिसे गुफाओं में योगासन लगाने का इच्छा हो वो भी जाकर खूब लगाए यदि हठयोग के द्वारा उसका कल्याण होता हो। [2]

जिसको धूनी एवं पंचाग्नि आदि तपस्या करने की इच्छा हो वो करे, जो जैसा भी प्रयत्न करना चाहे वो करले। [3]

मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि श्री वृंदावन की कुंजों में अकेला पड़ा रहकर अपने प्रियतम श्री बिहारीजी को अपना बनाकर उनसे नित्य लाड़ लड़ाता रहूँ। [4]