जब से निरखो ये श्याम पिया - ब्रज के सवैया

जब से निरखो ये श्याम पिया - ब्रज के सवैया

जब से निरखो ये श्याम पिया, तब से जिय धीर धरे कहो कैसे। [1]
नैन को बाण करारो लग्यो, मुस्कान को घाव पुरे कहो कैसे॥ [2]
बाँकी अदा बरछी सी लगी, लट में फंस के निकले मन कैसे। [3]
अरे भूत जो होई तो झरे, नंद पूत लग्यौ तो झरे कहो कैसे॥ [4]

- ब्रज के सवैया

जब से श्याम पिया को निहारा है, तब से मेरे हृदय में एक क्षण को भी चैन नहीं है। [1]

नैनों के तीक्ष्ण बाण ने गहरी चोट की है और सुंदर मुस्कान के घाव तो अब न जाने कब भरेंगे। [2]

श्यामसुंदर की बांकी अदाएँ बरछी की तरह चुभी हैं और उनकी सुंदर घुँघराली लटों से यह मन अब कैसे निकले? [3]

यदि किसी को भूत चिमट जाए तो उसका तो इलाज है, परंतु नंद का पूत (श्यामसुंदर) लग जाए तो इसका कोई इलाज नहीं। [4]