जिन रूठौ लागौं तिय पैयाँ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (34)

जिन रूठौ लागौं तिय पैयाँ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (34)

(राग केदारौ)
जिन रूठौ लागौं तिय पैयाँ ।
तेरे तन की सोभा सुंदरि,
मेरे उर लागति है झैयाँ ॥ [1]
तन मन वारौं एक रोम पर,
मेरौ मन लाग्यौ तो तैयाँ ।
श्रीबीठलविपुल विनोद ​​बिहारी
संभ्रम गयौ लाइ उर लैयाँ ॥  [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (34)

प्रियाजी की मनुहार करते हुए लाल निवेदन कर रहे हैं कि आपके चरणारविन्द में मैं नत हूँ, कृपया आप रूठें नहीं । 
हे सुन्दरि आपके श्रीअंग की माधुरी मेरे वक्ष्यस्थल पर प्रतिविम्बित हो रही है, इसीलिए आपको विभ्रम हो रहा है । [1] 

हे प्रिया ! आपके श्रीअंग के एक-एक रोम पर मैं अपना सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ। मेरा मन तो आपके प्रति ही समर्पित है । लाल के मुख-कमल से दीनतामुक्त वाणी का श्रवण कर प्रिया का संभ्रम मिट गया एवं प्रियतम को उन्होंने हृदय से आश्लेषित करते हुए विपुल विनोद से अभिभूत कर दिया । [2]