रसिक रासेश, रासेश्वरी, हृदयेश्वरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (56)

रसिक रासेश, रासेश्वरी, हृदयेश्वरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (56)

(कवित्त)
रसिक रासेश, रासेश्वरी, हृदयेश्वरी,
अब तो कृपा कोर, नैक मुस्कराईये। [1]
जीवन तो बीत्यो जात ऐसे साँझ भोर रात,
निज दासी शरण चरण, हियो सरसाईये॥ [2]
राधा राधा सुखद नाम भोर सांझ ये ही काम,
प्यारी तेरो निज धाम, करुना कोर आईये। [3]
श्यामा गोपाल हित, चरण छोड़ जाऊं कित, 
ऐसी भोरी लाड़ो छोड़, कौन पास जाईये॥ [4]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (56)

हे रसिकों की स्वामिनी, रास की स्वामिनी, मेरे ह्रदय की स्वामिनी, हे राधे! अब तो मेरी ओर कृपा भरी दृष्टि डाल मुस्कुरा दीजिए। [1]

मेरा जीवन बीता जा रहा है, आपकी यह दासी आपकी चरण शरण में है, आप मेरे ह्रदय को अपने प्रेम रस से सरस बनाइए। [2]

मेरा सुबह श्याम बस एक ही काम है कि मैं सुखद श्री “राधा राधा" नाम का भजन करता रहूँ। हे प्यारी, यह वृंदावन धाम आपका निज़धाम है कृपा कर मुझे अपने दर्शन से कृतार्थ करिए। [3]

श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि श्री श्यामा महारानी के चरणों को छोड़ कर मैं कहाँ जाऊँ ?  ऐसी भोरी प्यारी स्वामिनी को एक क्षण को भी छोड़ कर किसके पास जाऊँ ? [4]