(कवित्त)
जासों दुख जाइ कहौ सोइ रोवै दूनौ दुख,
तातें न कही जात बात कछु मन की। [1]
इहि कलि-काल मैं न गंध परमारथ कौ,
स्वारथ मैं मगन न जानैं दसा तन की॥ [2]
ऐसेन सों कहौ कौन भॉति मन-आस, जिय
बासना बसी है जो निबास वृन्दावन की। [3]
दृढ़ पन मेरै मैं सरन नित तेरैं अब,
कुँवरि किसोरी जू तुमहि लाज जन की॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
जिससे ह्रदय का दुख कहना होता है वही अपना दुगना दुख रोता है, अब कैसे किसी से अपने मन की बात को कहा जाए। [1]
इस कलयुग में परमार्थ (दूसरे का हित करना) की कहीं गंध भी नहीं आती, सब लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने में ही दिन रात मगन हैं। [2]
ऐसे में किससे मन आशा लगाये, बस अब ह्रदय की एक ही आशा है कि वृंदावन का वास मिले। [3]
श्री किशोरी अलि कहते हैं कि अब मैं दृढ़ता पूर्वक केवल श्री राधा की शरण में रहूँगा क्योंकि वे ही हैं जो अपने जनों की सदा लाज (रक्षा) रखने वाली स्वामिनी हैं। [4]
जासों दुख जाइ कहौ सोइ रोवै दूनौ दुख,
तातें न कही जात बात कछु मन की। [1]
इहि कलि-काल मैं न गंध परमारथ कौ,
स्वारथ मैं मगन न जानैं दसा तन की॥ [2]
ऐसेन सों कहौ कौन भॉति मन-आस, जिय
बासना बसी है जो निबास वृन्दावन की। [3]
दृढ़ पन मेरै मैं सरन नित तेरैं अब,
कुँवरि किसोरी जू तुमहि लाज जन की॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
जिससे ह्रदय का दुख कहना होता है वही अपना दुगना दुख रोता है, अब कैसे किसी से अपने मन की बात को कहा जाए। [1]
इस कलयुग में परमार्थ (दूसरे का हित करना) की कहीं गंध भी नहीं आती, सब लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने में ही दिन रात मगन हैं। [2]
ऐसे में किससे मन आशा लगाये, बस अब ह्रदय की एक ही आशा है कि वृंदावन का वास मिले। [3]
श्री किशोरी अलि कहते हैं कि अब मैं दृढ़ता पूर्वक केवल श्री राधा की शरण में रहूँगा क्योंकि वे ही हैं जो अपने जनों की सदा लाज (रक्षा) रखने वाली स्वामिनी हैं। [4]

