राधे हरि तेरौ नाम विचारै ।
तुम्हरेई गुन ग्रन्थित करि माला, रसनाकर सौ टारै ॥ [1]
लोचन-मूँदि ध्यान धरि, दृंढ करि, पलकन नैकु उघारै ।
अंग अंग प्रति रूप माधुरी, उर तै नहीं बिसारै ॥ [2]
ऐसो नेम तिहारे पिय कै, कह जिय निठुर तिहारै ।
सूर स्याम मनकाम पुरावहु, उठि चलि कहै हमारै ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
हे राधा, कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है । तुम्हारे गुणो की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं । [1]
आँख मूँदकर तुम्हारा ही रूप ध्यान इतनी दृढ़ता पूर्वक करते हैं कि पलकों को तनिक भी नहीं झपकते ।अंग-अंग के रूप माधुर्य को तनिक भी हृदय से विस्मृत नहीं होने देते । [2]
तुम्हारे प्रिय का ऐसा नियम है, और दूसरी ओर तुम क्यों निष्ठुरता ला रही हो ? श्री सूरदास (सखी भावापन्न) कहते हैं कि श्री कृष्ण की मनोकामना पूर्ण करो और हमारे कहने से उठ कर चलो । [3]
तुम्हरेई गुन ग्रन्थित करि माला, रसनाकर सौ टारै ॥ [1]
लोचन-मूँदि ध्यान धरि, दृंढ करि, पलकन नैकु उघारै ।
अंग अंग प्रति रूप माधुरी, उर तै नहीं बिसारै ॥ [2]
ऐसो नेम तिहारे पिय कै, कह जिय निठुर तिहारै ।
सूर स्याम मनकाम पुरावहु, उठि चलि कहै हमारै ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
हे राधा, कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है । तुम्हारे गुणो की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं । [1]
आँख मूँदकर तुम्हारा ही रूप ध्यान इतनी दृढ़ता पूर्वक करते हैं कि पलकों को तनिक भी नहीं झपकते ।अंग-अंग के रूप माधुर्य को तनिक भी हृदय से विस्मृत नहीं होने देते । [2]
तुम्हारे प्रिय का ऐसा नियम है, और दूसरी ओर तुम क्यों निष्ठुरता ला रही हो ? श्री सूरदास (सखी भावापन्न) कहते हैं कि श्री कृष्ण की मनोकामना पूर्ण करो और हमारे कहने से उठ कर चलो । [3]

