प्राननाथ व्रजनाथ जू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (28)

प्राननाथ व्रजनाथ जू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (28)

प्राननाथ व्रजनाथ जू, आरति हर नँद-नंद ।
धाइ भुजा भरि राखिये, डूबत भव 'हरिचंद' ॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (28)

हे प्राणनाथ, हे ब्रजनाथ, हे नंदनंदन श्रीकृष्ण! मेरे हृदय की पीड़ा को हर लीजिए। मैं भवसागर में डूब रहा हूँ—दौड़कर मुझे अपनी करुणामयी भुजाओं में भरकर सदा के लिए अपना बना लीजिए।