(सवैया)
जाको प्रेम भयो मनमोहन सों, वाने छोड़ दियो सगरो घर बारा।
भाव विभोर रहे निसिदिन, नैनन बहें अविरल धारा॥ [1]
मस्त रहे अलमस्त रहे, वाके पीछे डोलत नंद को लाला।
सुंदर ऐसे भक्तन के हित, बाँह पसारत नंदगोपाला॥ [2]
- श्री सुंदर जी
जिसको श्यामसुंदर से सच्चा प्रेम हो गया, उसके हृदय से स्वतः ही समस्त घर-बार एवं रिश्तेदारों की आसक्ति छूट जाती है। ऐसे जन निशिदिन भाव-विभोर अवस्था में रहते हैं, जिससे उनके नैनों से अविरल अश्रुधार बहते रहते हैं। [1]
ऐसे प्रेमी भक्त किसी की परवाह नहीं करते और नित्य ही प्रेम में छककर अलमस्त अवस्था में रहते हैं, क्योंकि उनके पीछे-पीछे श्यामसुंदर डोलते हैं। श्री सुंदर जी कहते हैं कि ऐसे भक्तों से मिलने के लिए तो नंदलाल श्रीकृष्ण भी प्रतीक्षा करते रहते हैं। [2]
जाको प्रेम भयो मनमोहन सों, वाने छोड़ दियो सगरो घर बारा।
भाव विभोर रहे निसिदिन, नैनन बहें अविरल धारा॥ [1]
मस्त रहे अलमस्त रहे, वाके पीछे डोलत नंद को लाला।
सुंदर ऐसे भक्तन के हित, बाँह पसारत नंदगोपाला॥ [2]
- श्री सुंदर जी
जिसको श्यामसुंदर से सच्चा प्रेम हो गया, उसके हृदय से स्वतः ही समस्त घर-बार एवं रिश्तेदारों की आसक्ति छूट जाती है। ऐसे जन निशिदिन भाव-विभोर अवस्था में रहते हैं, जिससे उनके नैनों से अविरल अश्रुधार बहते रहते हैं। [1]
ऐसे प्रेमी भक्त किसी की परवाह नहीं करते और नित्य ही प्रेम में छककर अलमस्त अवस्था में रहते हैं, क्योंकि उनके पीछे-पीछे श्यामसुंदर डोलते हैं। श्री सुंदर जी कहते हैं कि ऐसे भक्तों से मिलने के लिए तो नंदलाल श्रीकृष्ण भी प्रतीक्षा करते रहते हैं। [2]

