बार कत करति हमारिहिं बार !
राधे नाम सुनत ही धावति, सरल सुभायनहार ॥ [1]
यों रसिकन मुख कहत सुन्यों पुनि, क्यों निष्ठुरता धार ।
हौँ तो कुटिल अनादि काल को, अमित अघन अवतार ॥ [2]
पै तुम तो बिनु हेतु सनेहिनि, याको मोहिं विचार ।
ताहू ते 'कृपालु' बड़ चिंता, रसिक कहाउ लबार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (73)
हे श्री राधे! हमारी ही बार इतनी देर क्यों कर रही हो? तुम तो अपने सरल-स्वभाव-वश ‘राधे’ नाम सुनते ही अति अधीर होकर पतितों के पास आ जाया करती हो । [1]
ऐसा रसिकों के मुख से कहते हुए सुना है, फिर इतनी निठुराई क्यों धारण कर ली है? मैं यह मानता हूँ कि मैं अनादि काल का ही पतित हूँ। सचमुच पूछा जाय तो मैं अनन्त पापों का साक्षात् अवतार ही हूँ । [2]
पर फिर भी तुम्हें बिना कारण ही प्रेम करने वाली सुनकर मुझे विश्वास होता है कि मेरा भी काम बन जाएगा । जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं कि इससे भी बड़ी चिंता मुझे इस बात की है कि तुम्हारे रसिक जन लबार कहलायेंगे, उनकी बात का विश्वास संसार से उठ जायगा। [3]
राधे नाम सुनत ही धावति, सरल सुभायनहार ॥ [1]
यों रसिकन मुख कहत सुन्यों पुनि, क्यों निष्ठुरता धार ।
हौँ तो कुटिल अनादि काल को, अमित अघन अवतार ॥ [2]
पै तुम तो बिनु हेतु सनेहिनि, याको मोहिं विचार ।
ताहू ते 'कृपालु' बड़ चिंता, रसिक कहाउ लबार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (73)
हे श्री राधे! हमारी ही बार इतनी देर क्यों कर रही हो? तुम तो अपने सरल-स्वभाव-वश ‘राधे’ नाम सुनते ही अति अधीर होकर पतितों के पास आ जाया करती हो । [1]
ऐसा रसिकों के मुख से कहते हुए सुना है, फिर इतनी निठुराई क्यों धारण कर ली है? मैं यह मानता हूँ कि मैं अनादि काल का ही पतित हूँ। सचमुच पूछा जाय तो मैं अनन्त पापों का साक्षात् अवतार ही हूँ । [2]
पर फिर भी तुम्हें बिना कारण ही प्रेम करने वाली सुनकर मुझे विश्वास होता है कि मेरा भी काम बन जाएगा । जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं कि इससे भी बड़ी चिंता मुझे इस बात की है कि तुम्हारे रसिक जन लबार कहलायेंगे, उनकी बात का विश्वास संसार से उठ जायगा। [3]

