(सवैया)
नित्यविहार अधार दुरयौ, मिहरी कैं महल टहल में आइबौ। [1]
कर्म ज्ञान भक्ति मुक्ति, वैकुण्ठ में बैठि कहाँ लगि धाइबौ॥ [2]
यहै सुनि लै ब्रज-रीति उरें, रस-रीति सौं प्रीति अनन्य कहाइबौ। [3]
विषयिन के लालच पै न सरै, श्रीबिहारिनदास उदास ह्वै गाइबौ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (31)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सबका सार रस यह नित्यविहार रस सबसे परे की वस्तु है, जो नित्यविहारिणी जू (राधा रानी) के निज महल में केवल सहचरी भाव से ही उपलब्ध होता है। [1]
इसको कर्म, ज्ञान, भक्ति, मुक्ति एवं वैकुण्ठ की इच्छा रखकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। [2]
इन सबकी तो बात ही जाने दो, क्योंकि यह तो ब्रज की रस रीति वालों के लिए भी दुर्लभ वस्तु है। इस नित्यविहार रस को प्राप्त करने के लिए इस रस का ही अनन्य उपासक बनना पड़ता है, तब कहीं इस रस रीति में प्रवेश होता है। [3]
साधारण विषयों के लालचियों के लिए तो इन सब बातों का कोई अर्थ ही नहीं है। अतः इस रस की इच्छा रखने वालों को सबसे उदास होकर श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) के अनन्य दास होकर इस रस को हृदय से स्वीकार कर इसका सतत गान करना चाहिए। [4]
नित्यविहार अधार दुरयौ, मिहरी कैं महल टहल में आइबौ। [1]
कर्म ज्ञान भक्ति मुक्ति, वैकुण्ठ में बैठि कहाँ लगि धाइबौ॥ [2]
यहै सुनि लै ब्रज-रीति उरें, रस-रीति सौं प्रीति अनन्य कहाइबौ। [3]
विषयिन के लालच पै न सरै, श्रीबिहारिनदास उदास ह्वै गाइबौ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (31)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सबका सार रस यह नित्यविहार रस सबसे परे की वस्तु है, जो नित्यविहारिणी जू (राधा रानी) के निज महल में केवल सहचरी भाव से ही उपलब्ध होता है। [1]
इसको कर्म, ज्ञान, भक्ति, मुक्ति एवं वैकुण्ठ की इच्छा रखकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। [2]
इन सबकी तो बात ही जाने दो, क्योंकि यह तो ब्रज की रस रीति वालों के लिए भी दुर्लभ वस्तु है। इस नित्यविहार रस को प्राप्त करने के लिए इस रस का ही अनन्य उपासक बनना पड़ता है, तब कहीं इस रस रीति में प्रवेश होता है। [3]
साधारण विषयों के लालचियों के लिए तो इन सब बातों का कोई अर्थ ही नहीं है। अतः इस रस की इच्छा रखने वालों को सबसे उदास होकर श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) के अनन्य दास होकर इस रस को हृदय से स्वीकार कर इसका सतत गान करना चाहिए। [4]

