कुटिल लम्ब कल चीकने, मिहीं सघन तर कान ।
वार बार पर देत हैं, चतुरसखी प्रिय प्राण ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (4)
श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन पर समर्पित कर देती है।
वार बार पर देत हैं, चतुरसखी प्रिय प्राण ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (4)
श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन पर समर्पित कर देती है।

