श्रीराधे जु आसा पुजवौ मेरी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (291)

श्रीराधे जु आसा पुजवौ मेरी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (291)

(राग सारंग)
श्रीराधे जु आसा पुजवौ मेरी ।
हा हा कुँवरि किसोरी बलिजाऊँ, करहु आपनी चेरी ॥ [1]
मोहि स्यामकौ डर नहिं स्यामा, छुटत न आसा तेरी ।
अगति जाति तैं मेरी देही, भव सागर तें फेरी ॥ [2]
कामधेनु के संग न सोहै, सदाँ छोतिमय छेरी ।
तुव पद पंकज पारस परसत, व्यास कहा अब खेरी ॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी , पूर्वार्ध (291)

हे श्री राधे जू, तुम्हारी बलिहारी जाऊँ, मेरी इस आशा को पूर्ण करो कि मैं सदा सदा के लिए तुम्हारी दासी बन जाऊँ । [1] 

मुझे श्री कृष्ण (भगवान) का डर नहीं है प्यारी, मेरी समस्त आशाएँ तो एक मात्र आपसे ही हैं । अनंत जन्मों से सांसारिक आसक्ति एवं भोगों के कारणवश मेरी बुरी गति होती रही है जिसके कारण वश मैं भव सागर में आवागमन करता रहा हूँ । [2]

तुम्हारे चरणकमल जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले कामधेनु हैं, उनका मैंने कभी संग प्राप्त ही नहीं किया था जिसके कारण वश मैं सदा अपवित्र ही रहा । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब तुम्हारे प्रतापी चरण रूपी पारस का स्पर्श प्राप्त कर मुझे किस बात की चिंता रही अर्थात् समस्त चिंताओं का निवारण स्वतः ही हो गया । [3]