जलचर ज्यों जलभीर मै, जानत नाहिन पीर ।
विछुरे परै जब नीर तै, सच सचु जानै नीर ॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)
जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।
विछुरे परै जब नीर तै, सच सचु जानै नीर ॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)
जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।

