रंग भर्यौ मुसकात लला - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

रंग भर्यौ मुसकात लला - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

(सवैया)
रंग भर्यौ मुसकात लला, निकस्यौ कल कुंजन ते सुखदाई। [1]
मैं तबही घर ते निकसी, तकि नैन विशाल की चोट चलाई॥ [2]
रसखान सों घूमि गिरी धरनी , हरिनी जिमि बान लगे गिर जाई। [3]
टूटि गयो घर को सब बन्धन , छूटिगो आरज लाज बड़ाई॥ [4]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

प्रेम से भरे रंग में रँगा, मुस्कुराता हुआ वह मोहन सुंदर कुंज से बाहर निकला। [1]

मैं भी उसी समय घर से निकली थी, और उसके विशाल नेत्रों की चोट ने मुझे घायल कर दिया। [2]

श्री रसखान कहते हैं—मैं घूमकर भूमि पर गिर पड़ी, जैसे एक शिकारी का तीर लगने पर हिरनी गिर जाती है। [3]

हृदय में प्रेम की ऐसी चोट लगी है कि घर का सारा बंधन टूट गया, समाज की मर्यादा तथा लोकलाज भी छूट गए। [4]