(राग मलार)
हिंडोरे झूलत तन सुकुमार ।
पुलकि पुलकि राधे उर लागत, प्रीतम प्रान आधार ॥ [1]
भाइ बसन सजे मनसिज के, उर वर हार सुढार ।
सुख में झूलति कुँवरि लाड़िली, रमकत स्याम उदार ॥ [2]
जुगल सरूप अनूप विराजत, मनमथ भेद अपार ।
श्रीरसिक बिहारी की छवि निरखत, खरे कुंज के द्वार ॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (23)
सुकुमार शिरोमणि नित्यविहारी श्री युगल आनदोल्लास के हिंडोले पर झूल रहे हैं। श्री प्रियाजी पुलकित हो होकर अपने प्राणाधार प्रियतम के हृदय से लग रही हैं। [1]
यों तो दोनों के अंग-अंग अनंग के मन भाये वस्त्रालंकारों से सजे हैं, किन्तु उनके हृदयस्थल पर जो मन्मथ का मनोरम हार ढुलक रहा है, उसकी ढुरन का तो कहना ही क्या ! इधर लाड़-भरी किशोरी आनन्द में झूल रही हैं, उधर उदार चूडामणि श्रीश्यामसुन्दर परमसुख में रमक रहे हैं । [2]
अंग-अंग में अनंग की अनंत अनंत तरंगों से समुल्लसित होने के कारण दोनों की रूप माधुरी इस समय अपूर्व सौंदर्य को धारण कर रही है। श्रीविहारी-विहारिणी को इस अनुपम रुप माधुरी को स्वामी श्री रसिकदेव सदा निकुजमन्दिर के द्वार पर खड़े खड़े निहार रहे हैं और मुग्ध हो रहे हैं । [3]
हिंडोरे झूलत तन सुकुमार ।
पुलकि पुलकि राधे उर लागत, प्रीतम प्रान आधार ॥ [1]
भाइ बसन सजे मनसिज के, उर वर हार सुढार ।
सुख में झूलति कुँवरि लाड़िली, रमकत स्याम उदार ॥ [2]
जुगल सरूप अनूप विराजत, मनमथ भेद अपार ।
श्रीरसिक बिहारी की छवि निरखत, खरे कुंज के द्वार ॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (23)
सुकुमार शिरोमणि नित्यविहारी श्री युगल आनदोल्लास के हिंडोले पर झूल रहे हैं। श्री प्रियाजी पुलकित हो होकर अपने प्राणाधार प्रियतम के हृदय से लग रही हैं। [1]
यों तो दोनों के अंग-अंग अनंग के मन भाये वस्त्रालंकारों से सजे हैं, किन्तु उनके हृदयस्थल पर जो मन्मथ का मनोरम हार ढुलक रहा है, उसकी ढुरन का तो कहना ही क्या ! इधर लाड़-भरी किशोरी आनन्द में झूल रही हैं, उधर उदार चूडामणि श्रीश्यामसुन्दर परमसुख में रमक रहे हैं । [2]
अंग-अंग में अनंग की अनंत अनंत तरंगों से समुल्लसित होने के कारण दोनों की रूप माधुरी इस समय अपूर्व सौंदर्य को धारण कर रही है। श्रीविहारी-विहारिणी को इस अनुपम रुप माधुरी को स्वामी श्री रसिकदेव सदा निकुजमन्दिर के द्वार पर खड़े खड़े निहार रहे हैं और मुग्ध हो रहे हैं । [3]

