(कवित्त)
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के,
जावक सुरंग रँगे मनहि हरत हैं। [1]
‘हित ध्रुव’ रही फबि सुमिलि जेहरि-छबि,
नूपुर रतन-खचे दीप से बरत हैं॥ [2]
रीझि-रीझि सुंदर करनि पर पट धरैं,
आरसी सी लियैं लाल देखिबौ करत हैं। [3]
नख-मनि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज,
चंदनि के जूथ मानौं पायनि परत हैं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (18)
श्री प्रियाजी (राधा) के कोमल चरण स्वर्ण की आभा से दमकते हैं, और उन पर सजी लाल जावक की रंगत प्रियतम के हृदय को आकृष्ट करने वाली है। [1]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि उन चरणों पर सुशोभित जेहरि की छटा अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रही है। रत्नजड़ित नूपुर दीपक के समान प्रकाशमान हैं। [2]
श्री लाल जी बार-बार मोहित होकर उन चरणों को अपने कर-कमलों पर पीतांबर बिछाकर सम्मानपूर्वक विराजित करते हैं और दर्पण की भाँति उन्हें निहारते रहते हैं। [3]
श्री प्रिया के नखमणियों की उज्ज्वल कान्ति लाल के कर-कमलों पर इस प्रकार झलक रही है, मानो श्री राधा के चरणों पर चंद्रमा समूह विनयपूर्वक अनुनय कर रहे हों। [4]
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के,
जावक सुरंग रँगे मनहि हरत हैं। [1]
‘हित ध्रुव’ रही फबि सुमिलि जेहरि-छबि,
नूपुर रतन-खचे दीप से बरत हैं॥ [2]
रीझि-रीझि सुंदर करनि पर पट धरैं,
आरसी सी लियैं लाल देखिबौ करत हैं। [3]
नख-मनि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज,
चंदनि के जूथ मानौं पायनि परत हैं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (18)
श्री प्रियाजी (राधा) के कोमल चरण स्वर्ण की आभा से दमकते हैं, और उन पर सजी लाल जावक की रंगत प्रियतम के हृदय को आकृष्ट करने वाली है। [1]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि उन चरणों पर सुशोभित जेहरि की छटा अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रही है। रत्नजड़ित नूपुर दीपक के समान प्रकाशमान हैं। [2]
श्री लाल जी बार-बार मोहित होकर उन चरणों को अपने कर-कमलों पर पीतांबर बिछाकर सम्मानपूर्वक विराजित करते हैं और दर्पण की भाँति उन्हें निहारते रहते हैं। [3]
श्री प्रिया के नखमणियों की उज्ज्वल कान्ति लाल के कर-कमलों पर इस प्रकार झलक रही है, मानो श्री राधा के चरणों पर चंद्रमा समूह विनयपूर्वक अनुनय कर रहे हों। [4]

