श्री यमुना के नीर लौं, दिन-दिन आपहि आप ।
थिर न रहौं व्याकुल बहौं, सूखत हौं चुपचाप ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.4)
हे प्यारी जू! आपके दर्शनाभाव में मेरे नेत्रों से अश्रुधारा उसी प्रकार निरंतर बहती रहती है, जैसे श्री यमुना का जल प्रतिदिन बहकर नवीन रूप में प्रवाहित होता रहता है।
थिर न रहौं व्याकुल बहौं, सूखत हौं चुपचाप ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.4)
हे प्यारी जू! आपके दर्शनाभाव में मेरे नेत्रों से अश्रुधारा उसी प्रकार निरंतर बहती रहती है, जैसे श्री यमुना का जल प्रतिदिन बहकर नवीन रूप में प्रवाहित होता रहता है।

