पातकी हौं घातकी न सेवा तात मात की मैं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

पातकी हौं घातकी न सेवा तात मात की मैं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

(कवित्त)
पातकी हौं घातकी न सेवा तात मात की मैं,
भ्रात की न जात की कराई कुल हासनी। [1]
क्रूर हौं कपूत हौं कलंकी हौं कुचाली हौं मैं,
करत कुकर्मन भई है बुद्धि नां सनी॥ [2]
'लाल बलबीर' बड़ो लम्पट लवार हौं मैं,
लालची हौं लेवे मत धन कौं हुलासनी। [3]
पातक अगाधा कीये दीन सुखसाधा तुही,
हरौ मेरी बाधा राधा वृन्दावन बासनी॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

माना कि मैं पापी एवं हिंसक प्रवृति का हूँ जिसने माता, पिता, भ्राता आदि की कभी सेवा नहीं की एवं अपने कुल का सदा अपमान ही कराया है। [1]

मैं क्रूर, कपूत, कलंकी, दुष्ट हूँ जिसकी बुद्धि सदा कुकर्मों में ही लगी रही। [2]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि माना मैं बहुत बड़ा कामी, दग़ाबाज़, लालची हूँ जिसका चित्त धन में महासक्त रहता है। [3]

मैंने अनेक पाप किए हैं परंतु हे श्री राधा, आप तो दीनदुखियों को अपनाकर उन्हें सुख में डुबाने वाली हैं। अत: हे, वृंदावन की स्वामिनी, श्री राधा! अब मैं आपकी शरण में हूँ, अत: मुझ पर कृपा कर मेरी समस्त बाधाओं का हरण कीजिए। [4]