(राग दरबारी कान्हरा)
पिय बिन सूनो छै जी म्हारो देस ॥ [1]
ऐसो है कोई पिवकूँ मिलावै, तन मन करूं सब पेस ।
तेरे कारण बन बन डोलूं, कर जोगण को भेस ॥ [2]
अवधि बदीती अजहूँ न आए, पंडर हो गया केस ।
मीरा के प्रभु कब र मिलोगे, तज दियो नगर नरेस ॥ [3]
- श्री मीराबाई
मेरे प्रियतम श्री कृष्ण के वियोग में सारा संसार सूना लगता है। [1]
जो मुझे मेरे प्रिय प्रभु श्री श्यामसुंदर से मिलवा देगा, उसके लिए मैं अपना मन और तन न्योछावर कर दूंगी। श्री श्यामसुन्दर की लिए ही मैं एक जोगण का रूप धारण करके एक वन से दूसरे वन की यात्रा कर रही हूं। [2]
बहुत समय बीत चुका है, मेरे केश भी सफ़ेद हो गए है परंतु मेरे प्रभु ने अभी तक मुझे अपने दर्शन नहीं दिये । । श्री मीराबाई कहती हैं, "हे श्यामसुन्दर, आप मुझसे कब मिलेंगे, क्योंकि मैंने केवल आपके दर्शन के लिए अपने नरेश का नगर त्यागा है"। [3]
पिय बिन सूनो छै जी म्हारो देस ॥ [1]
ऐसो है कोई पिवकूँ मिलावै, तन मन करूं सब पेस ।
तेरे कारण बन बन डोलूं, कर जोगण को भेस ॥ [2]
अवधि बदीती अजहूँ न आए, पंडर हो गया केस ।
मीरा के प्रभु कब र मिलोगे, तज दियो नगर नरेस ॥ [3]
- श्री मीराबाई
मेरे प्रियतम श्री कृष्ण के वियोग में सारा संसार सूना लगता है। [1]
जो मुझे मेरे प्रिय प्रभु श्री श्यामसुंदर से मिलवा देगा, उसके लिए मैं अपना मन और तन न्योछावर कर दूंगी। श्री श्यामसुन्दर की लिए ही मैं एक जोगण का रूप धारण करके एक वन से दूसरे वन की यात्रा कर रही हूं। [2]
बहुत समय बीत चुका है, मेरे केश भी सफ़ेद हो गए है परंतु मेरे प्रभु ने अभी तक मुझे अपने दर्शन नहीं दिये । । श्री मीराबाई कहती हैं, "हे श्यामसुन्दर, आप मुझसे कब मिलेंगे, क्योंकि मैंने केवल आपके दर्शन के लिए अपने नरेश का नगर त्यागा है"। [3]

