सखी, हौं स्याम रंग रँगी।
देखि बिकाइ गई वह मूरति सूरति माहिं पगी ॥ [1]
संग हुतौ अपनौ सपनौ-सौ सोइ रही रस खोइ ।
जागेहुं आगें दृष्टि परै सखि नेकु न न्यारौ होइ ॥ [2]
एक जु मेरी अंखियन में निसिद्योस रह्यौ कर भौन ।
गाय चरावन जात सुन्यौ सखि! सो धौं कन्हैया कौन ॥ [3]
कासौं कहौं कौन पतियाबै, कौन करै बकवाद ।
कैसें के कहि जात ‘गदाधर’ गूंगे कौ गुड़ स्वाद ॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (34)
हे सखी मैं श्यामसुंदर के रंग में रंगी हूं । श्री श्याम सुंदर के सुंदर स्वरूप को निहार कर मैं बिक चुकी हूँ, और उसकी रूप माधुरी में सराबोर हो चुकी हूँ । [1]
जब मैं सपना लेती हूँ तो भी श्याम सुंदर के रस में ही खोई रहती हूं, इच्छा होती है कि सोती ही रहूँ । यदि मैं जागृत अवस्था में होती हूँ तो जहां भी दृष्टि पड़ती है वहीं श्यामसुन्दर खड़े होते हैं मानो एक क्षण को भी विलग नहीं होते । [2]
हे सखी, मैंने सुना है कन्हिया गाय चराने जाते हैं फिर वो जो मेरी आँखों के सामने दिन रात रहते हैं वो कौन से कन्हिया हैं ? [3]
अपने ह्रदय की बात किसको बताऊँ, कौन सच मानेगा ? किससे व्यर्थ ही चर्चा करूँ ? श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि यह तो ऐसी बात है कि जिस प्रकार गूँगा गुड़ का स्वाद किसी को बता नहीं सकता उसी प्रकार यह दिव्य रस की बातें मैं किसी को समझा नहीं सकती । [4]
देखि बिकाइ गई वह मूरति सूरति माहिं पगी ॥ [1]
संग हुतौ अपनौ सपनौ-सौ सोइ रही रस खोइ ।
जागेहुं आगें दृष्टि परै सखि नेकु न न्यारौ होइ ॥ [2]
एक जु मेरी अंखियन में निसिद्योस रह्यौ कर भौन ।
गाय चरावन जात सुन्यौ सखि! सो धौं कन्हैया कौन ॥ [3]
कासौं कहौं कौन पतियाबै, कौन करै बकवाद ।
कैसें के कहि जात ‘गदाधर’ गूंगे कौ गुड़ स्वाद ॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (34)
हे सखी मैं श्यामसुंदर के रंग में रंगी हूं । श्री श्याम सुंदर के सुंदर स्वरूप को निहार कर मैं बिक चुकी हूँ, और उसकी रूप माधुरी में सराबोर हो चुकी हूँ । [1]
जब मैं सपना लेती हूँ तो भी श्याम सुंदर के रस में ही खोई रहती हूं, इच्छा होती है कि सोती ही रहूँ । यदि मैं जागृत अवस्था में होती हूँ तो जहां भी दृष्टि पड़ती है वहीं श्यामसुन्दर खड़े होते हैं मानो एक क्षण को भी विलग नहीं होते । [2]
हे सखी, मैंने सुना है कन्हिया गाय चराने जाते हैं फिर वो जो मेरी आँखों के सामने दिन रात रहते हैं वो कौन से कन्हिया हैं ? [3]
अपने ह्रदय की बात किसको बताऊँ, कौन सच मानेगा ? किससे व्यर्थ ही चर्चा करूँ ? श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि यह तो ऐसी बात है कि जिस प्रकार गूँगा गुड़ का स्वाद किसी को बता नहीं सकता उसी प्रकार यह दिव्य रस की बातें मैं किसी को समझा नहीं सकती । [4]

