श्रीकुण्डे संततं यो निवसति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (100)

श्रीकुण्डे संततं यो निवसति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (100)

श्रीकुण्डे संततं यो निवसति पुरुषस्तस्य किंचिन्नकर्त्तु 
देवा: संघाः पितृणां मुनिवरनिचयाः सन्ति सामर्थ्ययुक्ताः ।
कृष्णोप्येतं नियोगे विरचयति किमु श्रीव्रजेन्दुःप्रयुक्तमेकां
देवीं किशोरी परिजनसहितां राधिकामन्तरेण ॥

- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (100)

श्रीराधाकुंड में जो पुरुष निरन्तर वास करता हैं, देवता- पितृ तथा मुनिवरों का समूह उसका कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं होते हैं। ब्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण भी औरों की सेवा में उसको नहीं जाने देते हैं । केवल अपने निज जनों के साथ अपनी प्रियतमा श्रीराधिका किशोरी की सेवा में ही उसे नियुक्त करते हैं ।