मो मन तम-तोमहि हरो, राधा को मुख चंद ।
बढ़े जाहि लखि सिंधु लौं, नंदनंदन आनंद ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (1)
श्री राधा का परम उज्ज्वल मुखचंद्र मेरे हृदय के अंधकार का नाश करे। जिस प्रकार चंद्रमा के दर्शन से समुद्र में ज्वार उमड़ता है, उसी प्रकार श्री राधा के मुखचंद्र को निहारकर श्री कृष्ण के आनंद-सागर में उल्लास की तरंगें उठती हैं।
बढ़े जाहि लखि सिंधु लौं, नंदनंदन आनंद ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (1)
श्री राधा का परम उज्ज्वल मुखचंद्र मेरे हृदय के अंधकार का नाश करे। जिस प्रकार चंद्रमा के दर्शन से समुद्र में ज्वार उमड़ता है, उसी प्रकार श्री राधा के मुखचंद्र को निहारकर श्री कृष्ण के आनंद-सागर में उल्लास की तरंगें उठती हैं।

