तेरी एक आस निधिवन ! अरदास करूँ,
पूरौ अभिलाष नित्य वृन्दावन - बास की। [1]
रसिकन-पद-रेनु आँजि-आँजि आँखिन में,
उरमें जगाऊँ जोति प्रेम के प्रकास की॥ [2]
दरसन पाऊँ नित्य लाड़ले बिहारीजू के,
नैनन निहारूँ छबि नित्य प्रेम-रस-रास की। [3]
स्यामा स्याम केलि-रस नित्त चित्त पान करै,
कृपा होंय ऐसी जब स्वामी हरिदास की॥ [4]
- सरसदासी लाडीवाल
मेरी एक आस श्री निधिवन राज से ही है, अत: मैं वहीं अपनी अरदास रखता हूँ कि मुझे श्री वृंदावन का अखंड वास वास प्राप्त हो। [1]
रसिक संतों की चरण रेणु को अपनी आँखों से लगाऊँ एवं अपने ह्रदय में प्रेम की ज्योति का प्रकाश जगाऊँ। [2]
नित्य श्री लाड़ले श्री बिहारीजू के दर्शन को पाया करूँ एवं उनके नैनों की छवि को निहारा करूँ जो प्रेम रस को बरसाने वाले हैं। [3]
श्री सरस दासी जी कहती हैं कि दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम की केलि रस का नित्य पान तभी हो सकता है जब ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा हो जाए। [4]
पूरौ अभिलाष नित्य वृन्दावन - बास की। [1]
रसिकन-पद-रेनु आँजि-आँजि आँखिन में,
उरमें जगाऊँ जोति प्रेम के प्रकास की॥ [2]
दरसन पाऊँ नित्य लाड़ले बिहारीजू के,
नैनन निहारूँ छबि नित्य प्रेम-रस-रास की। [3]
स्यामा स्याम केलि-रस नित्त चित्त पान करै,
कृपा होंय ऐसी जब स्वामी हरिदास की॥ [4]
- सरसदासी लाडीवाल
मेरी एक आस श्री निधिवन राज से ही है, अत: मैं वहीं अपनी अरदास रखता हूँ कि मुझे श्री वृंदावन का अखंड वास वास प्राप्त हो। [1]
रसिक संतों की चरण रेणु को अपनी आँखों से लगाऊँ एवं अपने ह्रदय में प्रेम की ज्योति का प्रकाश जगाऊँ। [2]
नित्य श्री लाड़ले श्री बिहारीजू के दर्शन को पाया करूँ एवं उनके नैनों की छवि को निहारा करूँ जो प्रेम रस को बरसाने वाले हैं। [3]
श्री सरस दासी जी कहती हैं कि दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम की केलि रस का नित्य पान तभी हो सकता है जब ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा हो जाए। [4]

