(राग कान्हरौ)
खंजन मीन मृगज मद मेंटत,
कहा कहौं नैननिं की बातैं ।
सुनी सुंदरी कहाँ लौं सिखईं,
मोहन बसीकरन की घातैं ॥ [1]
बंक निसंक चपल अनियारे,
अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं ।
डरत न हरत परायौ सर्वसु,
मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं ॥ [2]
नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि,
नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं ।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
भावै सो करहु प्रेम के नातैं ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)
हे प्रिया, मैं तुम्हारे नेत्रों की बात क्या कहूँ ? यह अपनी चंचलता से खंजन का, तिरछी गति से मीन का, और भोलेपन से मृगछोना का मद चूर चूर कर रहे हैं ।
सुनो सुन्दरि ! यह बताओ कि तुमने इन नेत्रों से (इनकी ओर देखने वाले को) मोहित करने के एवं अपने वश करने के लिए कितने दावपेश सिखा रखे हैं ? [1]
ये तुम्हारे चंचल नेत्र बाँकी चितवन वाले हैं, निडर हैं, चपल हैं, कटीले हैं, अरुण हैं, श्याम और स्वेत (वर्णों से युक्त) हैं । यह तुमने ऐसी अद्भुत रचना किस प्रकार कर ली?
यह दूसरे का सर्वस्व हरण करने में तनिक भी नहीं डरते एवं इनके कटाक्ष मीठी मदिरा के समान मादक हैं । [2]
हे सुंदरी, तुमने आज तक मेरी ओर किंचित् भी प्रसन्न एवं पूर्ण दृष्टि से नहीं देखा ।
(अतः ऐसी दृष्टि से देख लेना तो उचित ही है पर यदि न देखना चाहो तो) तुम्हारी इच्छा ! जो चाहो सो करो ! हे हंस कल गामिनि ! प्रेम के नाते से हमें यह सब स्वीकार है । [3]
खंजन मीन मृगज मद मेंटत,
कहा कहौं नैननिं की बातैं ।
सुनी सुंदरी कहाँ लौं सिखईं,
मोहन बसीकरन की घातैं ॥ [1]
बंक निसंक चपल अनियारे,
अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं ।
डरत न हरत परायौ सर्वसु,
मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं ॥ [2]
नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि,
नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं ।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
भावै सो करहु प्रेम के नातैं ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)
हे प्रिया, मैं तुम्हारे नेत्रों की बात क्या कहूँ ? यह अपनी चंचलता से खंजन का, तिरछी गति से मीन का, और भोलेपन से मृगछोना का मद चूर चूर कर रहे हैं ।
सुनो सुन्दरि ! यह बताओ कि तुमने इन नेत्रों से (इनकी ओर देखने वाले को) मोहित करने के एवं अपने वश करने के लिए कितने दावपेश सिखा रखे हैं ? [1]
ये तुम्हारे चंचल नेत्र बाँकी चितवन वाले हैं, निडर हैं, चपल हैं, कटीले हैं, अरुण हैं, श्याम और स्वेत (वर्णों से युक्त) हैं । यह तुमने ऐसी अद्भुत रचना किस प्रकार कर ली?
यह दूसरे का सर्वस्व हरण करने में तनिक भी नहीं डरते एवं इनके कटाक्ष मीठी मदिरा के समान मादक हैं । [2]
हे सुंदरी, तुमने आज तक मेरी ओर किंचित् भी प्रसन्न एवं पूर्ण दृष्टि से नहीं देखा ।
(अतः ऐसी दृष्टि से देख लेना तो उचित ही है पर यदि न देखना चाहो तो) तुम्हारी इच्छा ! जो चाहो सो करो ! हे हंस कल गामिनि ! प्रेम के नाते से हमें यह सब स्वीकार है । [3]

