जन्म मरन माया नहीं, जहँ निसि दिवस न होइ ।
सत चित आनंद एकरस, रूप अनुपम दोइ ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (9)
जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न माया का प्रभाव और न दिन-रात का क्रम; उस दिव्य वृंदावन धाम में अनुपम रूप वाले लाड़िली लाल सदा अपने सच्चिदानंद स्वरूप में एकरस नित्य विहार करते हैं।
सत चित आनंद एकरस, रूप अनुपम दोइ ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (9)
जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न माया का प्रभाव और न दिन-रात का क्रम; उस दिव्य वृंदावन धाम में अनुपम रूप वाले लाड़िली लाल सदा अपने सच्चिदानंद स्वरूप में एकरस नित्य विहार करते हैं।

