(कवित्त)
गुरनि बतायौ राधा मोहन हूँ गायौ,
सदा सुखद सुहायौ वृन्दावन गाढ़ें गहि रे। [1]
अद्भुत अभूत महि मंडल परे तें परे,
जीवन को लाहु हा-हा क्यों न लहै रे॥ [2]
आनन्द को घन छायो रहत निरन्तर ही,
सरल सुदेय सो पपीहा पन बह रे। [3]
जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर,
ऐसे पावन पुलिन पे पतित परयो रह रे॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रेम पत्रिका (51)
रसिक गुरुओं ने बताया है कि श्री धाम वृंदावन अगाध रस का धाम है जहां निवास करके श्री प्रिया प्रियतम का यशोगान करना चाहिए। [1]
इस भूमंडल पर स्थित श्री धाम वृंदावन अद्भुत एवं विलक्षण धाम है जिसकी महिमा अनिवर्चनीय है एवं सब की बुद्धि से अगम्य है। अरे मन! यहाँ पर निवास कर जीवन का लाभ क्यों नहीं लेता। [2]
यहाँ आनंद के बादल सदा छाये रहते हैं जिसके सरस रस को पपीहे की भाँति पान कर अपना जीवन सफल बनाना चाहिए। [3]
श्री यमुना के किनारे श्री राधा कृष्ण की अनंत केली लीलाएँ नित्य होती रहती हैं। अरे पतित, ऐसे पावन श्री धाम वृंदावन में सदा पड़ा रह। [4]
गुरनि बतायौ राधा मोहन हूँ गायौ,
सदा सुखद सुहायौ वृन्दावन गाढ़ें गहि रे। [1]
अद्भुत अभूत महि मंडल परे तें परे,
जीवन को लाहु हा-हा क्यों न लहै रे॥ [2]
आनन्द को घन छायो रहत निरन्तर ही,
सरल सुदेय सो पपीहा पन बह रे। [3]
जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर,
ऐसे पावन पुलिन पे पतित परयो रह रे॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रेम पत्रिका (51)
रसिक गुरुओं ने बताया है कि श्री धाम वृंदावन अगाध रस का धाम है जहां निवास करके श्री प्रिया प्रियतम का यशोगान करना चाहिए। [1]
इस भूमंडल पर स्थित श्री धाम वृंदावन अद्भुत एवं विलक्षण धाम है जिसकी महिमा अनिवर्चनीय है एवं सब की बुद्धि से अगम्य है। अरे मन! यहाँ पर निवास कर जीवन का लाभ क्यों नहीं लेता। [2]
यहाँ आनंद के बादल सदा छाये रहते हैं जिसके सरस रस को पपीहे की भाँति पान कर अपना जीवन सफल बनाना चाहिए। [3]
श्री यमुना के किनारे श्री राधा कृष्ण की अनंत केली लीलाएँ नित्य होती रहती हैं। अरे पतित, ऐसे पावन श्री धाम वृंदावन में सदा पड़ा रह। [4]

