किशोरी मेरी जीवन प्रान अधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (106)

किशोरी मेरी जीवन प्रान अधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (106)

(राग तिलककामोद व भैरवी)
किशोरी मेरी जीवन प्रान अधार ।
औरन से कुछ काम न मेरो, तुम साँची सरदार ॥ [1]
पतितन पावन टेक सदा की, रसिकन की रिझवार ।
शरणागत प्रतिपाल स्वामिनी, करुणा की भंडार ॥ [2]
तुमरो नाम रूप उर में धरि, तजी जगत की लार ।
“रूपमाधुरी" बात निभाज्यो, आन पड़ी हूँ द्वार ॥ [3]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (106)

हे किशोरीजू [श्री राधा]! तुम ही मेरे जीवन की एकमात्र आधार हो। आपके अतिरिक्त अन्य किसी और से मेरा कोई वास्ता नहीं; आप मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं । [1]

आपकी सदा की शपथ है कि आप सदैव पतितों को पावन करती हैं और रसिकों को सुख प्रदान करते हैं। आप अपने शरणागत भक्तों की रक्षक हैं एवं करुणा की भण्डार हैं। [2]

मैंने इस संसार को त्यागकर आपके नाम और रूप को ही अपने ह्रदय में धारण किया है । श्री रूप माधुरी प्रार्थना करते हैं कि कृपया मेरी बिगड़ी बनाने आजाना क्योंकि मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ"। [3]