नव निकुंज मन कौं अगम - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (2)

नव निकुंज मन कौं अगम - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (2)

नव निकुंज मन कौं अगम, सेवत कोटि अनंग ।
जुगल केलि आनंद को, तहाँ अखंडित रंग ॥

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (2)

नव निकुंज वन मन-बुद्धि से अगम्य है, जहाँ असंख्य कामदेव भी सेवा में तत्पर रहते हैं। वही श्री श्यामा-श्याम की दिव्य केलि-स्थली है, जहाँ प्रेम-रस का अखंड और अविच्छिन्न रंग निरंतर छाया रहता है।