ऐसी क्या आवश्यकता दुकूल सुखकारी की - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (79)

ऐसी क्या आवश्यकता दुकूल सुखकारी की - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (79)

(कवित्त)
ऐसी क्या आवश्यकता दुकूल सुखकारी की ?
प्यारी व्रजधूल सब देह में लगायेंगे। [1]
भोजन सुस्वादु लेके व्यञ्जनों को करेंगे क्या ?
माँग माँग टूक ब्रजवासियों के खायेंगे॥ [2]
टूट जाय वेद पन्थ छूट जाय लोक लाज,
हम तो सदैव हरेकृष्ण कृष्ण गायेंगे। [3]
जियेंगे तो यहीं पर मरेंगे तो यहीं पर,
वृन्दावन छोड़ कहीं बाहर न जायेंगे॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (79)

रेशमी वस्त्रों की हमें क्या आवश्यकता? हम तो वृंदावन की प्यारी रज को ही अपनी देह से लगाएँगे। [1]

अनेक प्रकार के भोजन के स्वाद लेकर हम क्या करेंगे? हम तो ब्रजवासियों की मधुकरी माँगकर ही खाएँगे। [2]

चाहे हमारा वैदिक मार्ग टूट जाए, चाहे हमारी लोक-लाज भी छूट जाए, हम तो सदैव “हरे कृष्ण, कृष्ण” का ही गायन करेंगे। [3]

यदि हम जियेंगे, तो यहीं और मरेंगे, तो भी यहीं। परंतु वृंदावन को छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे। [4]