यह आनंद कह्यौ ना परै री,
सेज महल क्रीड़त दोउ प्रीतम, सेवर समर हरै री ॥ [1]
कोटि अनंग बलि-बलि या छवि पर, रस बरसत न भरै री।
श्री ललित मोहिनी यह सुख विलसत देखत नैन सिरै री ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (48)
श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सखी ! इस नित्य विहार रस का वर्णन नहीं किया जा सकता । रंगमहल की सेज पर ये दोनों प्रिया-प्रियतम अद्भुत खेल, खेल रहे हैं । रस का सेवन करते हुए इन दोनों ने कामदेव को परास्त कर दिया है । [1]
(एक काम की तो बात ही क्या है ?) इनकी इस छवि पर कोटि-कोटि काम बलिहारी हैं। निरन्तर रस की वृष्टि करते हुए भी ये (प्रिया-प्रियतम) कभी तृप्त नहीं होते । ललितमोहन (श्रीकिशोर) एवं ललित मोहिनी (श्रीकिशोरी) को सतत यह सुख विलसते देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं । [2]
सेज महल क्रीड़त दोउ प्रीतम, सेवर समर हरै री ॥ [1]
कोटि अनंग बलि-बलि या छवि पर, रस बरसत न भरै री।
श्री ललित मोहिनी यह सुख विलसत देखत नैन सिरै री ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (48)
श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सखी ! इस नित्य विहार रस का वर्णन नहीं किया जा सकता । रंगमहल की सेज पर ये दोनों प्रिया-प्रियतम अद्भुत खेल, खेल रहे हैं । रस का सेवन करते हुए इन दोनों ने कामदेव को परास्त कर दिया है । [1]
(एक काम की तो बात ही क्या है ?) इनकी इस छवि पर कोटि-कोटि काम बलिहारी हैं। निरन्तर रस की वृष्टि करते हुए भी ये (प्रिया-प्रियतम) कभी तृप्त नहीं होते । ललितमोहन (श्रीकिशोर) एवं ललित मोहिनी (श्रीकिशोरी) को सतत यह सुख विलसते देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं । [2]

