मरौ ज्ञान वेदान्त को, जरौ कर्म को जाल ।
दया दृष्टि हम पै करौ, एक नंद के लाल ॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (29)
वेदान्त का शुष्क ज्ञान भले ही समाप्त हो जाए और कर्मों का यह कठिन जाल जलकर भस्म हो जाए; मेरी तो बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि नन्द के लाड़ले श्री कृष्ण मुझ पर अपनी एक करुणामयी दया-दृष्टि डाल दें।
दया दृष्टि हम पै करौ, एक नंद के लाल ॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (29)
वेदान्त का शुष्क ज्ञान भले ही समाप्त हो जाए और कर्मों का यह कठिन जाल जलकर भस्म हो जाए; मेरी तो बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि नन्द के लाड़ले श्री कृष्ण मुझ पर अपनी एक करुणामयी दया-दृष्टि डाल दें।

