सहज स्नेही श्याम के, बन बसि अनत न जाँइ।
ते राँचे सारे देश सौं, जहाँ तहाँ ललचाँइ॥
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (294)
जिन भक्तों के हृदय में श्री बिहारीजी के प्रति सहज और गाढ़ प्रेम बस जाता है, वे वृंदावन धाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाते। जिनका प्रेम अनन्य नहीं होता, वे अन्य स्थानों की आसक्ति में भटकते और ललचाते रहते हैं।
ते राँचे सारे देश सौं, जहाँ तहाँ ललचाँइ॥
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (294)
जिन भक्तों के हृदय में श्री बिहारीजी के प्रति सहज और गाढ़ प्रेम बस जाता है, वे वृंदावन धाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाते। जिनका प्रेम अनन्य नहीं होता, वे अन्य स्थानों की आसक्ति में भटकते और ललचाते रहते हैं।

