काहे खोजत ब्रह्म को, श्रुतिन ऋचन भरमाय ।
यशुमति कर ऊखल बंध्यो, देखहु ब्रज महँ जाय ॥
- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (91)
हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न हो तो स्वयं ब्रज जाकर दर्शन कर लो।
यशुमति कर ऊखल बंध्यो, देखहु ब्रज महँ जाय ॥
- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (91)
हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न हो तो स्वयं ब्रज जाकर दर्शन कर लो।

