जिनके देह नेह परि पूरण तें जगमगात जग माँहीं । [1]
जिन दरसें जिन परसें चिकनें रोम रोम ह्वै जाँहीं ॥ [2]
नरपसु दाग लगन उर जिन की बातें सुनत डराहीं । [3]
वल्लभ रसिक निसंक अंक भरि भरि तिन सों लपटांहीं ॥ [4]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (1)
श्री श्यामा श्याम की देह विशुद्ध प्रेम का प्रकाश है जिससे समस्त जग भी प्रकाशित होता रहता है । [1]
जिन रसिकों ने उन गौर श्याम वर्ण की देह का स्पर्श किया है, स्नेह से उनके रोम रोम चिकने हो गये हैं । [2]
इन रसिक लाड़ली लाल के प्रेम में जो दाग लगाते हैं वे नरपशु हैं, उनकी मैं बात तक भी सुनना नहीं चाहता हूँ । [3]
श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि मैं तो निशंक होकर, प्रिया प्रियतम को अपने अंक में भर भर कर, उनकी दिव्य देह से लिपटता रहता हूँ । [4]
जिन दरसें जिन परसें चिकनें रोम रोम ह्वै जाँहीं ॥ [2]
नरपसु दाग लगन उर जिन की बातें सुनत डराहीं । [3]
वल्लभ रसिक निसंक अंक भरि भरि तिन सों लपटांहीं ॥ [4]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (1)
श्री श्यामा श्याम की देह विशुद्ध प्रेम का प्रकाश है जिससे समस्त जग भी प्रकाशित होता रहता है । [1]
जिन रसिकों ने उन गौर श्याम वर्ण की देह का स्पर्श किया है, स्नेह से उनके रोम रोम चिकने हो गये हैं । [2]
इन रसिक लाड़ली लाल के प्रेम में जो दाग लगाते हैं वे नरपशु हैं, उनकी मैं बात तक भी सुनना नहीं चाहता हूँ । [3]
श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि मैं तो निशंक होकर, प्रिया प्रियतम को अपने अंक में भर भर कर, उनकी दिव्य देह से लिपटता रहता हूँ । [4]

