जो गिरि रुचे तो वसो श्री गोवर्धन  - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (22)

जो गिरि रुचे तो वसो श्री गोवर्धन - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (22)

(राग काफ़ी व बिलावल)
जो गिरि रुचे तो वसो श्री गोवर्धन, गाम रुचे तो वसो नंदगाम। [1]
नगर रुचे तो वसो श्री मधुपुरी, सोभा सागर अति अभिराम॥ [2]
सरिता रुचे तो वसो श्री जमुन तट, सकल मनोरथ पूरण काम। [3]
‘नन्ददास’ कानन रुचे तो, वसो भूमि वृंदावन धाम॥ [4]

- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (22)

यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो। [1]

यदि तुम्हें नगर रुचिकर हो तो मधुपुरी (मथुरा) में निवास करो, जो समस्त शोभा का सागर एवं मनोहर नगरी है। [2]

यदि तुम्हें नदी रुचिकर हो तो यमुना के तट पर विश्राम करो जहां समस्त हृदय की अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं। [3]

श्री नंददास कहते हैं कि यदि तुम्हें वन रुचिकर हो तो श्री धाम वृन्दावन की भूमि में निवास करो। [4]