कब तो भोरी स्वामिनी, यही रहे मन चाह ।
निरखूँ -परखूँ नित छवि, भरी प्रेम रस आह ॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (2)
हे भोली स्वामिनी श्री राधा! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे हृदय में केवल आपकी ही दर्शन-लालसा शेष रहेगी और मैं प्रेम-रस से भरी आह भरते हुए, निरंतर आपकी झलक पाने को व्याकुल पुकार करूँगी?
निरखूँ -परखूँ नित छवि, भरी प्रेम रस आह ॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (2)
हे भोली स्वामिनी श्री राधा! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे हृदय में केवल आपकी ही दर्शन-लालसा शेष रहेगी और मैं प्रेम-रस से भरी आह भरते हुए, निरंतर आपकी झलक पाने को व्याकुल पुकार करूँगी?

