जब तें दरसे मनमोहन जू तब तें अँखियाँ ये लगीं सो लगीं  - श्री ठाकुर जी

जब तें दरसे मनमोहन जू तब तें अँखियाँ ये लगीं सो लगीं - श्री ठाकुर जी

(सवैया)
जब तें दरसे मनमोहन जू, तब तें अँखियाँ ये लगीं सो लगीं। [1]
कुलकानि गई सखि बाही घरी, ब्रजराज के प्रेम पगीं सो पगीं॥ [2]
कहैं ‘ठाकुर' नेह के नेजन की, उर मैं बनी आनि खगीं सो खगीं। [3]
अब गाँवरे नाँवरे कोऊ धरौं, हम साँवरे रंग रँगी सो रँगी॥ [4]

- श्री ठाकुर जी

जब से श्रीकृष्ण की मोहिनी मूरत का दर्शन हुआ है, तब से उनकी वह छवि मेरी आँखों में बस गई है। [1]

हे सखी! कुल की मर्यादा और बाहरी लाज सब चली गई, क्योंकि ब्रजराज के प्रेम में पूरी तरह डूब गई। [2]

अब तो श्रीकृष्ण के प्रेम के नेत्रों की तीखी तलवार मेरे हृदय में पूर्ण रूप से गड़ चुकी है और मुझे वश में कर चुकी है। [3]

अब हमें किसी गाँव या कुल की पहचान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम उस साँवरे रंग में रंग गए हैं। [4]