आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.3)

आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.3)

(राग जैजैवन्ती)
आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं ।
साँवरे पिया के संग, भीजी है मदन रंग,
मोद की उमंग अंग गुन ग्रंथ खोलहीं ॥ [1]
जैसे दामिनी घन माहीं, ऐसे भामिनी तनु माहीं,
लखि आपनी परछाँहीं, हँसि हंसि बोलहीं । 
भगवत लाल बिहारी, पाई है कहाँ बर नारी,
रूप गुन वैस हमारी, करत कलोलहीं ॥ [2]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ (7.3)

(प्रिया जी परिहास करने में बड़ी निपुण है। वे आज प्रियतम से नटखटी कर रही हैं ।) 

आज जो शोभामयी श्रीकिशोरी जी (श्री राधा) प्रेम रस में उन्मत्त होकर डोल (घूम) रही हैं । वे प्रियतम प्यारे के साथ दिव्य मदन के रंग में सराबोर हो रही हैं और उनके अंग अंग से आनंद की उमंगें ऐसे बरस रही हैं, जैसे (हाव भाव आदि) गुणों का खजाना ही खुल गया हो । [1]

जिस प्रकार बादलों में बिजली चमकती है उसी प्रकार श्री श्यामसुन्दर के तन से लगी भामिनी अपनी ही परछाँहीं देख कर हंस हंस कर बोलने लगी कि हे लाल बिहारी ऐसी सुंदर वर (नारी) तुमने कहाँ से पाई जो हमारे ही रूप, गुण, एवं वयस (उम्र) की है और हमारे ही समान कलोल करती है । [2]