अब ये लोचन श्याम के, सखी हमारे नाहिं ।
बसे श्याम रस रूपये, श्याम धसे इनमाहिं ॥
- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
हे सखी, अब ये नेत्र मेरे नहीं रहे; ये तो श्री श्यामसुंदर के अधिकार में चले गए हैं। इनमें उनका ही रूप-रस बस गया है और वे इन अँखियों में निरंतर निवास करते हैं।
बसे श्याम रस रूपये, श्याम धसे इनमाहिं ॥
- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
हे सखी, अब ये नेत्र मेरे नहीं रहे; ये तो श्री श्यामसुंदर के अधिकार में चले गए हैं। इनमें उनका ही रूप-रस बस गया है और वे इन अँखियों में निरंतर निवास करते हैं।

