(राग चैती गौरी)
जमुनापुलिन कुंज गहिवरकी कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचावौं। [1]
पदपंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै मधुरी मधुरी गुँज सुनावौं ॥ [2]
कूकरि ह्वै वनवीथिन डोलौं बचे सीथ रसिकनके पावौं । [3]
ललितकिशोरी आस यहै मम व्रजरज तजि छिन अनत न जावौं ॥ [4]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)
कब मैं जमुना पुलिन स्थित गह्वर वन में कोकिल बनकर द्रुम पर बैठकर श्यामा श्याम के लिए मधुर गान करूँगा । [1]
कब मैं प्रिया लाल के चरण कमलों का भौंरा बनूँगा और मधुर ध्वनि से गुंजार करके उन्हें सुख पहुँचाऊँगा । [2]
कब मैं कूकरि होकर वन की गलियों में डोलूँगा और रसिकों के टूक को पाऊँगा। [3]
श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि मेरी तो बस यही आशा है कि ब्रज की रज को छोड़ कभी कहीं न जाऊँ । [4]
जमुनापुलिन कुंज गहिवरकी कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचावौं। [1]
पदपंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै मधुरी मधुरी गुँज सुनावौं ॥ [2]
कूकरि ह्वै वनवीथिन डोलौं बचे सीथ रसिकनके पावौं । [3]
ललितकिशोरी आस यहै मम व्रजरज तजि छिन अनत न जावौं ॥ [4]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)
कब मैं जमुना पुलिन स्थित गह्वर वन में कोकिल बनकर द्रुम पर बैठकर श्यामा श्याम के लिए मधुर गान करूँगा । [1]
कब मैं प्रिया लाल के चरण कमलों का भौंरा बनूँगा और मधुर ध्वनि से गुंजार करके उन्हें सुख पहुँचाऊँगा । [2]
कब मैं कूकरि होकर वन की गलियों में डोलूँगा और रसिकों के टूक को पाऊँगा। [3]
श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि मेरी तो बस यही आशा है कि ब्रज की रज को छोड़ कभी कहीं न जाऊँ । [4]

