जो सुख ब्रज में एक घरी - श्री सूरदास, सूरसागर (687)

जो सुख ब्रज में एक घरी - श्री सूरदास, सूरसागर (687)

(राग रामकली)
जो सुख ब्रज में एक घरी ।
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष-पुरी ॥ [1]
अष्ठ सिद्धि नवनिधि कर जोरे, द्वारैं रहतिं खरी ।
सिव सनकादि - सुकादि अगोचर, ते अवतार हरी ॥ [2]
धन्य-धन्य बड़भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी ।
ऐसैं सूरदास के प्रभु कौं, लीन्हों अंक भरी ॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर (687)

ब्रज में जो आनन्द प्रत्येक घड़ी हो रहा है, वह आनन्द तीनों लोकों में नहीं है। यह गोप-नगरी धन्य है । [1]

आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ द्वार पर यहाँ हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं; क्योंकि शिव, सनकादि ऋषि तथा शुकदेवादि परमहंसों के लिये भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, उन श्रीहरि ने यहाँ अवतार लिया है । [2]

परम सौभाग्यवती श्रीयशोदाजी धन्य हैं, धन्य हैं, यह आज वेद भी सत्य मानते हैं क्योंकि सूरदास के ऐसे महिमामय प्रभु को उन्होंने गोद में ले लिया है । [3]