मस्त रहे अपने मन में - ब्रज के सवैया

मस्त रहे अपने मन में - ब्रज के सवैया

मस्त रहे अपने मन में, कबहूं नहि व्यापत लाभ न हानि। [1]
नाम जपे मन ही मन में, मनमोहन सौं नित प्रीत निभानी॥ [2]
लोग बहु विधि के जग में, सब बोले भले कहके कटु वानी। [3]
औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुराइन राधिका रानी॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हम नित्य अपनी मस्ती में रहते हैं, न हमें लाभ की चिंता है और न ही हानि की। [1]

हम मन ही मन, श्वास-श्वास से नाम जप करते हैं; हमें और किसी से कोई सरोकार नहीं, हमें तो बस मनमोहन श्री कृष्ण से ही प्रीति निभानी है। [2]

इस संसार में भांति-भांति के लोग हैं, चाहे वे हमें कटु वाणी ही क्यों न बोलें। [3]

हमें किसी की परवाह नहीं, क्योंकि हमारी स्वामिनी तो स्वयं श्री राधा महारानी हैं। [4]