प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (121)

प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (121)

प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है ।
चितवत चित हरें, प्रानन आनंद करें, ताही रंग भरें, आली देह सुधि हारी है ॥ [1]
लपटि महा रस बेली, ललित सुखद झेली, विवस बिहार बढ्यौ रूप एक सारी है ।
नवल निकुंज दोउ, जानत न कौन कोउ, दासी हरि सावधान रीझि रीझि वारी है ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (121)

श्री प्रिया जू (श्री राधा) की चितवन सहज में ही प्रेम प्रदान करने वाली है । एक नयन कटाक्ष ही चित्त को हर लेता है, प्राणों में आनंद का संचार करता है एवं उसमे विभिन्न रंग भर देता है, जिससे सखियाँ अपनी देह की सुधि भूल जाती हैं । [1]

श्री श्यामा जू महा प्रेमरस से भरकर श्री श्यामसुंदर को आलिंगन करती हैं, उन्हें आनंद प्रदान करतीं हैं, एवं सहज रूप से उनका विहार बढ़ने लगता है, जिनका स्वरुप एक समान है । नवल निकुंज में दोनों प्रिया-प्रियतम विराजमान हैं, प्रेमरस में स्वयं को भूलें हैं, दासियाँ सावधान हैं एवं नित्य-विहार का दर्शन कर प्रफुल्लित हो उनपर स्वयं को न्योंछावर करती हैं । [2]