तौलौं यह फांसी गरे - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (143)

तौलौं यह फांसी गरे - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (143)

तौलौं यह फांसी गरे, वर्णाश्रम व्रत नेम ।
नारायण जौलौं नहीं, मुँह दिखरायो प्रेम ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (143)

जब तक हृदय में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं होता, तब तक वर्णाश्रम धर्म, व्रत और नियमों का बंधन गले की फाँसी के समान बना रहता है। प्रेम के उदय होते ही ये बाह्य बंधन स्वतः शिथिल हो जाते हैं।