(कवित्त)
याचौं नाहिं शेष हू महेश हू सुरेश हू कौं,
आन देवता कौ वरदान न चहत हौं। [1]
कामधेनु कल्पवृक्ष कौन गिनती में यहाँ,
कर री चार बातें यमराज सौं कहत हौं॥ [2]
रसिकनि प्यारी वृषभानु की दुलारी रानी,
कीरति कुमारी के बल निबहत हौं। [3]
मोर कौ मुकुट जाके माथे पै बिराजै ताकी,
राधा पटरानी की पटी में बसत हौं॥ [4]
- श्रीराधाचरण (लल्लू जी)
न मैं शेष से याचना करता हूँ, न शिवजी से, न इंद्र से, और न ही अन्य किसी देवी देवता का वरदान चाहता हूँ। [1]
कामधेनु एवं कल्पवृक्ष की तो व्यर्थ में कौन गिनती करे, मैं तो निर्भय होकर यमराज से भी चार बातें करने को कह रहा हूँ। [2]
मेरा निर्वाह तो अनन्य रसिकों की प्राण प्यारी, श्री वृषभानु दुलारी, कीरति कुमारी श्री राधा महारानी के बल से हो रहा है। [3]
जिनके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, उनकी पटरानी श्री राधा के संग मैं सदा वास करता हूँ। [4]
याचौं नाहिं शेष हू महेश हू सुरेश हू कौं,
आन देवता कौ वरदान न चहत हौं। [1]
कामधेनु कल्पवृक्ष कौन गिनती में यहाँ,
कर री चार बातें यमराज सौं कहत हौं॥ [2]
रसिकनि प्यारी वृषभानु की दुलारी रानी,
कीरति कुमारी के बल निबहत हौं। [3]
मोर कौ मुकुट जाके माथे पै बिराजै ताकी,
राधा पटरानी की पटी में बसत हौं॥ [4]
- श्रीराधाचरण (लल्लू जी)
न मैं शेष से याचना करता हूँ, न शिवजी से, न इंद्र से, और न ही अन्य किसी देवी देवता का वरदान चाहता हूँ। [1]
कामधेनु एवं कल्पवृक्ष की तो व्यर्थ में कौन गिनती करे, मैं तो निर्भय होकर यमराज से भी चार बातें करने को कह रहा हूँ। [2]
मेरा निर्वाह तो अनन्य रसिकों की प्राण प्यारी, श्री वृषभानु दुलारी, कीरति कुमारी श्री राधा महारानी के बल से हो रहा है। [3]
जिनके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, उनकी पटरानी श्री राधा के संग मैं सदा वास करता हूँ। [4]

