श्रीबृन्दावन प्यारौ प्यारी कौ तासौं मेरौ अविचल प्यार ।
निश दिन छिन छिन द्विगुन चतुर्गुन वढ़न चढ़न श्री वन उनिहार ॥ [1]
विविध वल्लरी विलसित कुसुमित कोटि कलप पल्लव रतनार ।
श्रीरामराय राधामाधव कौ होत निरन्तर रासविहार ॥ [2]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)
श्री वृंदावन धाम श्री राधा प्यारी को अत्यंत प्रिय है इसलिए श्यामसुन्दर को वृंदावन प्राणों से भी अधिक प्यारा है । निशिदिन, छिन छिन, उनका वृंदावन के प्रति प्रेम दुगना, चौगुना होकर बढ़ता रहता है क्योंकि यह राधा प्यारी का ही अभिन्न स्वरूप है । [1]
असंख्य बहुमूल्य रत्न के समन कोमल पत्तों संग खिले हुए फूलों से सुशोभित यहाँ की विभिन्न लताएँ हैं । श्री रामराय जी कहते हैं कि यह श्री वृंदावन धाम ही है जो श्री राधा माधव की नित्य रास विहार स्थली है । [2]
निश दिन छिन छिन द्विगुन चतुर्गुन वढ़न चढ़न श्री वन उनिहार ॥ [1]
विविध वल्लरी विलसित कुसुमित कोटि कलप पल्लव रतनार ।
श्रीरामराय राधामाधव कौ होत निरन्तर रासविहार ॥ [2]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)
श्री वृंदावन धाम श्री राधा प्यारी को अत्यंत प्रिय है इसलिए श्यामसुन्दर को वृंदावन प्राणों से भी अधिक प्यारा है । निशिदिन, छिन छिन, उनका वृंदावन के प्रति प्रेम दुगना, चौगुना होकर बढ़ता रहता है क्योंकि यह राधा प्यारी का ही अभिन्न स्वरूप है । [1]
असंख्य बहुमूल्य रत्न के समन कोमल पत्तों संग खिले हुए फूलों से सुशोभित यहाँ की विभिन्न लताएँ हैं । श्री रामराय जी कहते हैं कि यह श्री वृंदावन धाम ही है जो श्री राधा माधव की नित्य रास विहार स्थली है । [2]

