जय जय जय जय जय श्री राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, राग संग्रह (38)

जय जय जय जय जय श्री राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, राग संग्रह (38)

जय जय जय जय जय श्री राधा ।
जब तें प्रगट भई बरसाने नासी जन के तन की बाधा ॥ [1]
सब सखी आनंदित मन में अति चरण कमल अवराधा ।
‘हरीचंद’ ब्रजचंद पिया को प्रेम पंथ जिन साधा ॥ [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, राग संग्रह (38)

श्री राधा की जय हो । जब से बरसाने में श्री राधा प्रकट हुई हैं तब से उन्होंने अपने जनों की समस्त बाधाओं का हरण कर लिया है । [1]

समस्त सखियाँ अपने मन में अति हर्षित हैं एवं श्री राधा के चरण कमलों का ही अनन्य भजन कर रही हैं । अपने प्रियतम ब्रजचन्द्र (श्री कृष्ण) को जिन्होनें प्रेम पंथ से साधा है, ऐसी श्री राधा की जय हो । [2]